दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग ने कहा कि, "हमारे सिख भाईयों ने अपने गुरुद्वारे सभी के लिए खोल रखे हैं, तो फिर मस्जिद में प्रवेश करने में संकोच क्यों होना चाहिए?"
#NajeebJung#SocialUnity#IndiaNews
It’s Friday, which means anyone (not just my black fam) on my Twitter feed can win a free lunch today.
Follow ✅
Like ✅
Retweet ✅
& drop your $Cashapp to be considered for the Win.
I’ll comment when I've selected someone. #SocialUnity#FridayFeeling
नफरत के सौदागरों को अब भाईचारे से खौफ लगने लगा है!
जब अपनी सियासी जमीन खिसकती दिखी, तो सचिन तिवारी 'मजहब' के नाम पर जहर उगलने लगे। जनता सब देख रही है कि कैसे हार के डर से समाज को बांटने की साजिश रची जा रही है।
#Politics#StopHatred#SocialUnity#Truth#मुस्लिम
Minister @U_Consolee & @unwomenrwanda Rep. @JennetKem co-chaired a consultative meeting to review Rwanda's priorities for #CSW69, focusing on strengthening collaboration to ensure cohesive participation and progress on gender equality&women's empowerment in line with Agenda 2030.
Sports chants and concert rhythms do more than entertain.
They create social unity through shared emotional alignment.
Read and listen:
Like and share.
#SocialUnity#CollectiveJoy#Quantumarian
@PoojaHindu50@51tankarv फूट फिल्म निर्माता नहीं डाल रहे, बल्कि वो लोग डाल रहे हैं जिन्होंने सालों तक कड़वे सच को दबाए रखा। फिल्मों को दोष देने के बजाय उन घटनाओं की निंदा होनी चाहिए जो समाज को खोखला कर रही हैं। आईना दिखाने वाले को बुरा कहने से हकीकत नहीं बदल जाती। 🇮🇳 #TruthPrevails#SocialUnity
"जाति जनगणना के साथ-साथ गोत्र भी पूछा जाए! इससे यह पता चलेगा कि किस गोत्र में कौन-सी जातियाँ हैं। सामाजिक संरचना को समझने और एकता बढ़ाने के लिए यह ज़रूरी है"। #CasteCensus#Gotra#SocialUnity
ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद
ब्राह्मणवाद की कब्र खुदेगी JNU की धरती पर …..
ब्राह्मण हेट और यहूदी नरसंहार कनेक्शन?
सामाजिक न्याय के नाम पर ये जो नारे लगाए जाते हैं, उनमें एक बुनियादी दिक्कत है. मैं इस पर बहस करने के लिए तैयार हूँ.
तो जाति आधारित भेदभाव को ब्राह्मणवाद कहा जाता है. इसके पीछे का तर्क है कि जाति व्यवस्था को बनाने वाले ब्राह्मण थे. इसके विरोध में मनु स्मृति जलाते हैं. ऐसा करने वालों का मानना है कि मनु ने अपनी किताब में ऐसा लिखा है. लेकिन कमाल की बात है कि मनु ब्राह्मण नहीं थे. मत्स्य पूरण के मुताबिक 14वें मनु का नाम श्रद्धादेव था. और वो द्रविड़ देश राजा हुआ करते थे. बाद में इन्ही के वंश में इक्ष्वाकु, पृथु, रघु और राम चन्द्र जी पैदा हुए. इसका मतलब है कि मनु महाराज खुद क्षत्रिय थे.
लेकिन ये तर्क देना कि जाति व्यवस्था की शुरुआत “मनु स्मृति” से हुई, ये भी अर्ध सत्य है. मनु स्मृति वेद वांग्मय की कई स्मृतियों में से एक है. यह स्मृतियाँ ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यह एक तरह से इस सभ्यता का पहला व्यवस्थित कानून है. लेकिन मनु स्मृति में दिए गए नियम किसी भी कालखंड में पूरी तरह से लागू हुए हों ऐसा प्रमाण इतिहास में नहीं मिलता. कोई भी राज्य मनु स्मृति के आधार पर चला हो, ऐसा उदाहरण इतिहास में नहीं है. मनु स्मृति में उस समय की सामाजिक मान्यताओं के आधार पर वर्णों के काम और उन्हें ना करने पर क्या सजा होनी चाहिए इसका उल्लेख भर है.
तो फिर क्या जाति व्यवस्था ऋगवेद के पुरुष सूक्त से उपजी है. इसका भी जवाब नहीं है. पुरुष सूक्त के 13वें श्लोक में यह कहा गया है ब्राह्मण मुख से, क्षत्रिय बाहू से राजन्य, उदर से वैश्य और पैरों से शुद्र जन्मते हैं. इस श्लोक को बार-बार गलत अर्थों में पेश किया जाता है. पुरुष सूक्त में ईश्वर की कल्पना एक विराट पुरुष के तौर पर की गई है. जिनके मन से चन्द्र, चक्षु से सूर्य इन्द्रियां अग्नि से और प्राण वायु से जन्मते हैं.
इसका मतलब ये नहीं है कि पुरुष सूक्त पढ़कर समाज चार वर्णों में बंटा. यह पहले से इन चार वर्णों में बंटा हुआ था. और यह अकेले भारत की कहानी नहीं है. दुनिया भर की तमाम सामाजिक व्यवस्थाओं में इस किस्म की हैरारकी देखने को मिलती है. चाहे मेसोपोटामिया हो या ग्रीक सिटी स्टेट. और यह सिलसिला मध्यकाल तक चलता है. आज भी इंग्लैंड के हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स का ढांचा इसी व्यवस्था पर आधारित दिखेगा.
तो जाति व्यवस्था किसने और कब शुरू की, इसका कोई ठोस जवाब हमारे पास नहीं है.
ऐसे में सवाल यह है कि जाति आधारित भेदभाव के लिए सिर्फ ब्राह्मणों को दोषी क्यों ठहराया जाता है? जबकि लगभग सब जातियां अपने से छोटी जाति के साथ भेदभाव करती आ रही हैं. इतिहास में जो भेदभाव एक ब्राह्मण ने एक जाटव के साथ किया उतना ही भेदभाव एक कुर्मी, मीणा और यादव ने एक जाटव के साथ किया. फिर उसी जाटव ने एक वाल्मीकि के साथ भेदभाव करने में कोई कंजूसी नहीं बरती. भारत में जाति आधारित भेदभाव एक सच्चाई है लेकिन यह बात भी उतनी ही सच है कि जातिगत भेदभाव कई परतों में काम करता है.
तो फिर ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद के नारे क्यों लग रहे हैं. जवाब है कि दूसरे विश्वयुद्ध में यहूदियों का नरसंहार क्यों हुआ. ऐसा नहीं है कि यहूदियों को अचानक से हिटलर ने निशाना बनाना शुरू कर दिया. यहूदियों के खिलाफ नफरत की जड़े 1900 साल पुरानी थीं. कभी उन्हें जीसस का हत्यारा कहा गया, कभी ब्लैक डेथ का जिम्मेदार बताया गया.इस सबने हिटलर को नरसंहार करने का ग्राउंड दिया. और भरोसा मानिए, हिटलर के दौर पर उसके इन कदमों पर किसी सवाल खड़े नहीं किए. यहूदियों के नरसंहार के किस्से तो जर्मनी की हार के बाद सामने आए.
ब्राह्मणों के खिलाफ पिछले चार दशक से एक हेट कैम्पेन चल रहा है. क्योंकि OBC और दलितों को एक छतरी के नीचे लाने के लिए एक बड़े दुश्मन की जरुरत थी जिसका भय दिखाकर यह गोलबंदी की जा सके. नफरत की राजनीति में एक डर, एक भय का होना जरुरी है. इसलिए कभी इस्लाम खतरे में होता है, कभी हिन्दू खतरे में होता है, कभी गोरा खतरे में होता है.
जिस जाति आधारित भेदभाव में समाज की लगभग हर जाति शामिल है, उस अपराध की गठरी सिर्फ ब्राह्मणों के मत्थे डाल दी गई है. ये राजनीतिक जालसाजी है.
'ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद' सिर्फ एक नारा नहीं है. यह जिनोसाइड की भूमिका है.
प्रोफेसर शुभम शुक्ला (जातीय नफरत मामलों के जानकर✍🏻✍🏻
@Shubhamshuklamp जाति आधारित भेदभाव के लिए केवल ब्राह्मणों को दोषी ठहराना एक गहरी राजनीतिक साजिश है। 'ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद' जैसे नारे केवल नफरत फैलाते हैं और सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देते हैं। ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करना बंद होना चाहिए ताकि समाज में वास्तविक समरसता आए।
#SocialUnity
So TODAY is actually Friday (😂) which means anyone on my feed can win a lunch!
Follow ✅
Like ✅
Retweet ✅
& drop your $Cashapp in this thread for a chance to win.
I’ll comment when I've selected someone. #SocialUnity#FridayFeeling